*ऋषियों ने कहा है कि संसार में शुद्ध ज्ञान सबसे पवित्र वस्तु है।* *जितना सुख, शुद्ध ज्ञान से मिलता है, इतना और भौतिक पदार्थों से नहीं मिलता।* *महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने तो अपनी पुस्तक ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में एक स्थान पर लिखा है,* *संसार के उत्तम उत्तम भौतिक पदार्थों से जो सुख मिलता है, वह विद्या प्राप्ति से होने वाले सुख के 1000वें अंश के समतुल्य भी नहीं हो सकता।*
*इससे पता चलता है कि ज्ञान कितनी ऊंची पवित्र एवम् सुखदायक वस्तु है। इसलिए लोग ज्ञान प्राप्ति के लिए, अपने घर परिवार और यहाँ तक कि अपना देश भी छोड़ कर विदेश में दूर तक जाते हैं।*
*दूसरी बात - यह है कि,* *ज्ञान अथवा विद्या को प्राप्त करके एक रोग भी उत्पन्न होता है, जिसका नाम है अभिमान।* *आपने यदि यह अभिमान उत्पन्न कर लिया, तब तो वह ज्ञान विष के तुल्य हो जाएगा और विनाशक होगा।* *यदि कोई तपस्वी बुद्धिमान पुरुषार्थी व्यक्ति, विद्या अथवा ज्ञान को प्राप्त करके अभिमान को उत्पन्न न होने दे, उसके स्थान पर नम्रता भाव को उत्पन्न कर ले, बस फिर तो उसके लिए वह ज्ञान अमृत के समान है।* *इसलिए ज्ञान प्राप्त अवश्य करें , उसके बाद अभिमान को उत्पन्न न होने दें, नम्रता को धारण करें। वह ज्ञान आपके लिए वरदायक सिद्ध होगा..!!*
*🙏🏼🙏🏻🙏🏾जय जय श्री राधे*🙏🙏🏽🙏🏿