Hindi Quote in Poem by shiv bharosh tiwari

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*किसान आंदोलन*
किसानों के आंखों के सम्मुख
पड़ी असम्भव की शिला
चाँद का पिछला हिस्सा टूटा
गिरा अमावस की किला।

आत्म-्संज्ञ,निज चेतस पाहुन करणी
छिटकी बरफ़ चादर सी धरणी
कृतिमयी कृतिमान मुस्कान लिये
पलथी मार दिल्ली की मुड़ेरान सिये
कोषों दूर न दिखती कागज की वार्ता
संकेतिक भी नही कोई आशा की यात्रा
फ़सलों पराली के धुआँ वस्त्र
रोड़ की शैया पर न कोई बिस्तर के शस्त्र
पथरीली कंटीली कपोलों पर
फूलों सी बिखरीं मुस्कान।

स्वार्थ युक्त मानसिकता सूक्ष्मतम-
मकड़ी के जालों सा
मांगों के द्वारे लटके हुए
अहंकारों के तालों सा
जीने की तनिक आशा के छिद्र
बचाना हे भगवान।

चढ़ते उतरते जीनों की सीढ़ियाँ
बोलेंगी रहती पाताली खोहों से प्रेत सी
बोलें संतरी मंत्री नही सिंघासन डोलेगा?
पीता किसान पोखर का पानी
टेरों सा भूखा सा
किसानों की पीड़ा चिल्लाती
जो दिन रात सड़क से
दिल्ली की झन झन करती
गलियारों में भी गूँजता।

शासन के दिए घावों को वो चूसता
निंदा उपहासों के होंठों को वो चूमता
घृणा भरी झापड़ सी लगती
सीधों के जब गालो पर।
रचनाकार:-शिव भरोस तिवारी 'हमदर्द'
सर्वाधिकार सुरक्षित
09/12/2020

Hindi Poem by shiv bharosh tiwari : 111623736
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