आग में ज़िदगी को तपा कर जिये हैं
सर झुकाकर नहीं सर उठा कर जिये हैं
भीख मांगी न मझधार से है रहम की
बीच लहरों के हम मुस्कुरा कर जिये हैं
चाँद-तारों का कोई न अहसान हम पर
हम अँधेरों को साथी बनाकर जिये हैं
नाम से लोग डरते हैं जिनके हमेशा
हाथ उन हादसों से मिला कर जिये हैं
महावीर प्रसाद ‘मधुप’