टूटे बस्ते का ,मां सिलती हैं कोना,
चुराती है आंखे ,
छिपाती हैं आंसू,
फिर उम्मीद भर बस्ते में,
रखती हैं मेरे कंधो पे,
मै पुछता हुं मां!
क्या मेरा नया बस्ता,
कभी नहीं होगा?
रखकर हाथ मेरे सिर पे,
धीरज से कहती है मेरी मां,
जरूर होगा , जरूर होगा।
-Supriya