(((...इश्क़ में वफ़ा...)))
काफ़िरों के दौर में मोहब्बत की इल्तिजा चाहते हो...
तुम भी क्या खूब हो जनाब, इश्क़ में वफ़ा चाहते हो...
लिख- लिख कर ज़ख्मों को यूँ कुरेदना...
ख़ुद ही ख़ुद को सताकर, महबूब से ज़फा चाहते हो...!
तुम भी क्या खूब हो जनाब, इश्क़ में वफ़ा चाहते हो...!
ग़ज़ल- ए- महफ़िल में, ग़म- ए- दिल बयां कर...
ख़ुद से ख़ुद ही होना क्यूँ खफ़ा चाहते हो...
बड़े जोखिम हैं इस ज़ाम- ए- इश्क़ में...
अपने हर घाटे के बदले यूँ नफ़ा चाहते हो...!
तुम भी क्या खूब हो जनाब, इश्क़ में वफ़ा चाहते हो...!
हर लफ्ज़ में निकल रही है, आह क़लम की...
अब भी लिखना तुम सौ दफ़ा चाहते हो...
किताबों में ढूँढ रहे हो मोहब्बत...
सीखने को मोहब्बत का फलसफा चाहते हो...!
तुम भी क्या खूब हो जनाब, इश्क़ में वफ़ा चाहते हो...!
रोग- ए- इश्क़ का कोई शिफाखाना नहीं...
होकर निजात तुम पाना रफ़ा चाहते हो...
बड़े नापाक- ज़ालिम इस ज़माने में...
अपनी रूह को करना सफ़ा चाहते हो...!
तुम भी क्या खूब हो जनाब, इश्क़ में वफ़ा चाहते हो...!
मेरा लिखना मेरे देव से है...
देव को ही तुम करना रफा-दफा चाहते हो...!
तुम भी क्या खूब हो जनाब, इश्क़ में वफ़ा चाहते हो...!
~माहिरा चौधरी ✍️
....... शुक्रिया.........
((रफ़ा - खुशी ))