प्रेम करने लगे हो मुझे तुम अगर
मेरे जीवन से खेलो ना यूं जान कर
मै नहीं हूं मुसाफिर जो जाऊं गुजर
तुम चलो साथ मेरे सनम मान कर
क्यूं सताते हो इतना की मै हार जाऊं
नफ़रत में सारा स्नेह मार जाऊं
शिकायत है कोई तो खुल कर कहो
शिकायत में सारा वहम वार जाऊं
क्या चिढ़ना चिढ़ाना यही प्यार है
खुद को ऊंचा उठाना यही प्यार है
ऐसा प्रेमी भी क्या प्रेमी हुआ
प्रेम में सब भुलाना यही प्यार है
प्रेम करते हो तो कृष्ण राधा बनो
साथ रह ना सको जीवन आधा बनो
नाम ऊंचा करो स्नेह से स्नेह का
ना मिलने पर कंटक न बाधा बनो
इस तरह से जियो ना हो पीना जहर
याद रक्खे जमाना जो जाओ गुजर
दाग़ दामन पे कोई लगे ना कभी
स्नेह में इस तरह हो जाओ अमर
।। ज्योति प्रकाश राय।।