ग्लोबल वार्मिंग
ग्लोबल वार्मिंग हो गया मानव जीवन में
कहीं प्रेम की बाढ़, अतिवृष्टि है।
कहीं सूखा, अनावृष्टि है।
विश्वास के स्तर में छेद हो गया है।
बेवफाई की एसिड वर्षा हो रही।
तो कहीं बर्फबारी।
कहीं बादल गरजे
कहीं बिजली गिरी।
घृणा, लोभ, संदेह, क्रोध का बढ़ा प्रमाण
मानव का बिगड़ा संतुलन, तापमान।
परिवार के पेड़ कटते जा रहें ।
संवेदनाशून्य शुष्क रण बढ़ता जा रहा।
काम के जानवर जंगल से बाहर निकल पड़े शिकार में।
मोह के मगरमच्छ सागर के बाहर आ गये।
प्रेम का आयुष्य कम हो गया है।
प्रेम जन्मा ही बीमार
बचपन व जवानी में ही बूढ़ा हो गया।