तुम्हारा पता मैंने डायरी के अंतिम पन्ने पर लिख छोड़ दिया था.. मगर कभी चाहा नहीं उस शहर आना। तुम्हें लिखे ख़त भी मैंने कभी तुम्हें नहीं भेजे..
ऐसा बहुत कुछ है जो तुम्हारे लिए है मगर मेरे पास है..
वो जो मंदिर से मैंने काला धागा लिया था उसे बांधना था मुझे तुम्हारी कलाई में..
तुम्हारी पसन्द की खीर बनाकर, मैंने उसे घर के उस कोने में रखा जहाँ किसी की नज़र ना पड़े.. चाहती थी तुम चख कर बताओ कैसी है.. मगर मुमकिन नहीं था और वो ख़राब हो गई।
खैर जाने दो..
अब जब तुम पराए हो चुके हो तो तुम्हें कुछ भेजूंगी मैं..
तुम्हारे नए पते पर..
वो गुलाब जो मैंने डाल से तोड़ा था तुम्हें देने.. मगर उसने मेरी किताब में दम तोड़ दिया.. तुम्हारे हाथों की नर्मी का उसे कभी साथ नहीं मिला.. अब उसे तुम्हें भेजना है मुझे..।
और वो मेहंदी जो तुमने चुपके से मेरे हाथों में लगाई थी..
उसके सूखने पर, मैंने उसे झड़ाकर एक रुमाल में रख दिया था.. तुम उस सूख चुकी मेहंदी को तुम्हारे आँगन की मिट्टी में मिला देना..
फिर मैं तुम्हारी यादों को आँसुओं में मिला प्रेम का रंग उतरने की प्रतीक्षा करुंगी..।
~रूपकीबातें
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