तीन सो पैंसठ दिन
अगर मेरा बस चले
तो लिखूं हर दिन एक कविता।
तीन सो पैंसठ दिन।
मेरा मन बन जाए कविता उगलता मशीन।
हर दिन रहू मैं कविता लिखने में लीन।
हर कविता हो जनमन से अभिन्न।
हर कविता हो एक से बठकर एक हो बेहतरीन।
सहृदय हो आफ़रीन, होकर पढ़े तल्लीन।
कोई पढ़ते हो जाए गमगीन।
कोई जोश में चढ़ा ले आस्तीन।
शब्द, भाव, भाषा, शैली हो नित नवीन।
सुख पर लिखूं, दुःख पर लिखूं।
तृप्ति पर लिखूं, भूख पर लिखूं।
नैन पर लिखूं, मुख पर लिखूं।
आम पर लिखूं, खास पर लिखूं।
मौके पर लिखूं, बेमौके पर लिखूं।
सारी कविताएँ कूड़े में चली जाए।
बस एक कविता सबको भा जाए।
साल में नहीं तो दसकों में, दसकों में नहीं तो पूरे जीवन में
बस एक कविता ही काफी है कालजयी होने के लिए।
-दीपेश कामडी 'अनीस'