सुदंर गजल ..
रदीफ .क्या करोगे ..
काफिया .ओ ..
दिल ही जो खुश नहीं तो नजारों का क्या करोगे ।
जो खिजा में जिन्दगी हो तो बहारों का क्या करोगे ।।
मुकम्मल करोगे कैसे तमन्ना हजार दिल की ।
जो एक नहीं होती हजारों का क्या करोगे ।।
कोई गुलाभ तुमको आ जाए गर पंसद भी ।
लिपटे है कयी कांटे उन कांटो का क्या करोगे ।।
जमाने से अब ये कह दो आशिक नही रहा वो ।
अब तो गिरा दो इनको दिवारों का क्या करोगे ।।
उल्फत में वो तो उनकी तारें भी तोड़ लायें ।
कोई मगर ये पुछे के तारों का क्या करोगे ।।
जब हौसला नही था समंदर में तुम क्यूँ उतरे ।
कश्ती है तलातल में किनारों का तुम क्या करोगे ।।