समानता का अधिकार
एक वृक्ष जो उम्रदराज हो चुका था और कभी भी जमीन पर धराशायी होने की स्थिति में था। वह अपनी जवानी के दिनो को याद कर रहा था जब उसकी चारों दिशाओं में फैली हुई शाखाओं के नीचे पथिक आराम करते थे और बच्चे फलों का आनंद लेते थे। एक वृद्ध व्यक्ति उसके तने का सहारा लेकर विश्राम करने लगा। वह मन ही मन सोच रहा था कि उसका एक पुत्र और पुत्री दो बच्चे है। उसने अपने पुत्र पर पुत्री की अपेक्षा अधिक ध्यान दिया, उसे उच्च शिक्षा दिलायी और एक कुलीन परिवार में विवाह भी कराया। उसे अपने पुत्र से काफी आशायें थी परंतु वह इतना निकम्मा और चालाक निकला कि पिता की सब संपत्ति हडप कर उन्हें ऐसी स्थिति में पहुँचा दिया कि वे स्वयं घर छोडकर कही अन्यत्र अपना बसेरा की तलाश कर ले। ऐसे कठिन समय में उनकी बेटी व दामाद उन्हें सम्मानपूर्वक अपने घर ले आये और सेवा सुश्रुषा सब करते हुए उनसे पुराने बातों को भूल जाने का आग्रह करते थे। उन्हें जानकारी मिली की उनका बेटा व बहू नौकरी के सिलसिले में अमेरिका चले गये है। अब दिन ढलने का समय हो गया था और वह वृद्ध व्यक्ति वापिस अपनी बेटी के घर चला गया।
उस रात अचानक ही उसकी तबीयत खराब हुई और अथक प्रयासों के बाद भी उसकी प्राणरक्षा संभव नही हो सकी और रात में ही उसकी मृत्यु हो गई। उसकी बेटे को इसकी सूचना दी गई तो उसने अपनी नौकरी से छुट्टी ना मिलने की बात कहकर वापिस आने से मना कर दिया। दूसरे दिन उसका अंतिम संस्कार एवं समस्त परंपरायें उसकी बेटी के द्वारा संपन्न की गई। शम्शान घाट में अग्निदाह देने के उपरांत सभी लोग चले गये केवल उसकी लडकी दुखी मन से अपने पिता के साथ बिताये हुये दिनों की याद करते हुए उनकी जलती हुई चिता को एकटक देख रही थी। जब काफी समय व्यतीत हो गया तो उसका पति ने उसके कंधे पर हाथ रखकर धीरे से समझाते हुए कहा कि जो चला गया वह अब वापिस नही आयेगा, आओ अब हम वापिस चले। वह इतना कहकर उसे सांत्वना देते हुए अपने सीने से लगाकर उसकी अश्रुपूर्ण आंखो से आंसुओं को पोंछते हुए वे दोनो वापिस अपने घर की ओर चले जा रहे थे। इससे यह जनसंदेश मिलता है कि आज के वर्तमान युग में पुत्री किसी भी रूप में पुत्र से कम नही होती और दोनो में भेद करना समाप्त होना चाहिए।