धर्म की आड़ में जेबें भरना , आज नया सा धंधा है
बिना विचारे लोभी मानुष , इस भेड़चाल में अंधा है
निज हित में धर्मांध हो पंडे , कर्म ये कितना गन्दा है
पढ़े लिखे भी लोग ना समझें , ये फांसी का फंदा है
धर्म काम के नाम पे जोड़ें , बेहिसाब का चंदा है
लोग ना सोचें ना ही विचारें , सच है या झूठा बंदा है
सब मठाधीश बन धूनी रमाते , धंधा नहीं ये मंदा है
#धर्मांध