#मिट्टीकी
ना यहाँ वहाँ ढूंढ मुझे,
मैं यही हूँ, यही पर तेरे दिल में।
घुंघराले बिखरे बालों में,
नींद से भरे सवालों में।
पत्तों से भरी डाली में,
गरम चाय की प्याली में।
पी ले मुझे भी बार-बार ,
लगातार जायका लिए !
मैं पकडी हुई कलाई हूँ ,
थामी हुई सच्चाई हूँ ।
मैं जब दूर हूँ, तब भी पास हूँ ।
और पास हूँ तो और पास हूँ !
तुम्हें ज़िंदा रखे हुई
हर साँस मिट्टी हूँ मैं!
अंतर कहाँ जो अंतर एक ?
प्रेम स्वयं जहाँ सदेह !
और सिद्ध, स्वयं हम हो;
या हम हो या मर्म हो।
कहीँ कोई बंध नहि
कोई ज़िद, ना कोई फ़ासले...
©लीना प्रतीश