यह कैसा दौर आगया
इनसान को इनसान से ही भय हो गया
सांसों पर एक अनजान वायरस का कब्ज़ा है
गृहबास और लोगों से दुरी ही बचाब की बनी वजह है
जीबन की रफ़्तार रुक सी गयी है
डर डर के हर कोई जी रहा है
अबसाद्ग्रस्त हो इनसान जीबन हार चला है
तनाब, घरेलु हिंसा, बेरोजगारी का लगा मेला है
मज़दूर थक हार भूखे प्यासे अपने घर को लौट चला है
संक्रमण का राक्षस बाहें फैलाये हर दिशा मैं खड़ा है
जीबन मैं मचा हा हा कार है
महामारी ने बिश्व को अपने चपेट मैं ले लिया है
vaccine बन ने की देर से जीबन हात से फिसल रहा है.