आज कल लगता है हवा
पानी भी जैसे मैं खा रही हूँ,
क्या जीन्स क्या कुर्ती? पुरानी
साड़ी में भी नहीं आ रही हूँ।
क्या करूँ तो पहले जैसी
पतली हो जाऊ ?
सोचने बैठु तो दिमाग में
भी नही समा रही हूँ।
फ़ूल बन कर आई थी,
हाउसफुल बन गई हूँ अब!
छोटी सी बाल्कनी में,
बादलों सी छा रही हूँ।
पड़ोसन भी तो खाती होगी,
क्या पता उसे क्यूँ चढ़ता नही?
मानो खाती है वह, और
उसका खाया भी मैं चढ़ा रही हूँ।
बर्तन घिसने पर, हाथ घिस
जाते है यह नुस्खा काम कर जाए;
यही सोच कर मैं ज़्यादा
ही घिस घिस कर न्हा रही हूँ ।
एक ही टुकड़ा बचा था
मेरे हिस्से घर पर बनी केक का।
सासुमा की फ़रमाइश पर रोज़
नई नई डिश जो बना रही हूँ।
बड़ी महेनत की पर यह
उत्तरने का नाम नहीं ले रहा।
अब तो एक ही रास्ता, अपने
किरदार का वज़न बढ़ा रही हूँ ।
© लीना प्रतीश