मैं भूल नहीं पाया हूँ तिरा दुलार मिरी माँ
रोता हूँ आज पाने को तिरा प्यार मिरी माँ ।
कहाँ से अब वह रोटी मिलतीं तेरे हाथ की
यादों में अब तेरे हाथों की मार मिरी माँ ।
अब हमसफर चिलचिलाती धूप का साया यहाँ
और तेरी गोद करती नहीं इंतजार मिरी माँ ।
यहाँ मिरे हर ज़ख्म को कुरेदते हैं लोग तो
किससे करूँ अपने दर्द का इज़हार मिरी माँ ।
तेरा ख़ून हार मानता क्या इस ज़माने से
तूफ़ान से लड़ने को इब्न तैयार मिरी माँ ।
तू रोज मेरे ख्वाब में आ मुझे सुलाया कर
मत करना मिरी फ़रियाद को इंकार मिरी माँ ।
अब तेरे जिगर का टुकड़ा भी टूट जाता है
सह नहीं पाता ये नाजुक दिल प्रहार मिरी माँ ।
छुट्टी के दिन लड़ आऊँ और छिप जाऊँ गोद में
कब आएगा ऐसा कोई इतवार मिरी माँ ।
तिरा जाया 'मन' तो सदा रहा जलता सितम से
पर इसने किया नहीं वक्त से करार मिरी माँ ।
✍️___गिर्राज कटारा
इब्न अर्थात पुत्र
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