दिल और दिमाग के संतुलन में देह कई बार पीछे छूट जाती है। समाज में व्याप्त कई विसंगतियां देहधर्म से उपजी होती हैं। संयुक्त परिवार विघटन से कितने ही नौकरीपेशा युवा परिवार से दूर हैं। कभी कभी कैरियर ओरिएंटेड दम्पत्ति भी साथ साथ नहीं रह पाते और कभी किसी मजबूरीवश कोई दुनिया में अकेला रह जाता है। भूख-प्यास की तरह देह की नैसर्गिक जरूरतें भी होती हैं, इनसे उपजे प्रश्नों का समाधान तलाशने की कोशिश है साझा उपन्यास #देह_की_दहलीज_पर .... आज इसकी आठवीं किश्त प्रकाशित होने जा रही है आपके अपने पोर्टल मातृभारती पर... पढ़कर प्रतिक्रिया अवश्य दीजिएगा...🙏