समकालीन यथार्थ में नये कीर्तीमान बनाती हुई सबल स्त्री तू हमेशा से पथप्रदर्शिका है। कभी माँ चण्डी के रुप में दुष्टों की संहारनी और रक्तपान करता तेरा विकराल रुप तो दूसरी ओर अपने स्तनों को निचोड़ कर जीवन देता तेरा ममतामयी बात्सल्य, कभी देश की सीमा पर जान की बाजी लगाती सशक्त प्रहरी तो कभी अपने ही पति को परमेश्वर बना कर उसकी अनुगामिनी, कभी आसमान छूती है तू निडर सहासी वही दूसरी ओर तू स्वेच्छा से संस्कारों के चरण स्पर्श भी करती है। अविष्कारक है तू प्रेम की, स्नेह की और ममता की, सेती है तू अपने रक्त कणों से कोख में नव अंकुर को जनने से पहले और अनगिनत पाप-पुण्य का भार अपने सीने पर उठाये पृथ्वी है तू....अब नही होगी तू भोग्या......
नित्य नये आयामों को छूती हे सृजना! तू सम्मान के श्रंगार से खुश होना, गौरव का गहना पहनना, महत्वाकाक्षाँओं से सजना, आत्मसम्मान से आत्मसात होना, स्वयं को समय देना, स्वप्न को साकार करना और......जीना थोड़ा सा अपने लिये......
छाया अग्रवाल
8 मार्च 2020