जब भी उनसे की वफ़ा तो जख़्म ये खाते रहे ,
वो रक़ीबों से निभाकर हम को दिखलाते रहे ।
ज़िन्दगी की तल्ख़ियाँ जब बेहिसाब सी हो गईं ,
ले के तेरा नाम रस्मन ख़ुद को बहलाते रहे ।
वो रहे ग़ैरों के लेकिन दिल कहाँ ये मानता ,
दिल कभी हमको कभी हम दिल को समझाते रहे ।
ज़िक्र छेड़ा जब वफ़ा का मैंने उन के सामने ,
याद कर अपने सितम वो सिर्फ़ मुस्काते रहे ।
हम रहे जलते तुम्हारे साथ की हसरत लिए ,
यूँ रक़ीबों की रक़ाबत की सजा पाते रहे ।
~~ Ridj ~~