संघर्ष
श्री देवेन्द्र सिंह मैनी 84 वर्ष के हो चुकें है। उनका जन्म वर्तमान पाकिस्तान के पुंछ क्षेत्र में हुआ था।
उनका कथन है कि वे अपने आप को बहुत भाग्यशाली मानते है कि उन्हे इतनी लंबी आयु ईश्वर ने दी है। वे अपने जीवन से बहुत संतुष्ट एवं प्रसन्न हैं। वे इसके लिए वाहे गुरू को धन्यवाद करते है।
उन्हें कैंसर हो गया था जो कि थर्ड स्टेज पर पहुँच चुका था किंतु उन्होंने समाज सेवा के कार्य पूर्ण लगन एवं समर्पण के साथ करना नही छोडा था। वे अपनी बीमारी से संघर्ष करके सफल होकर आज पूर्णतया स्वस्थ्य है।
जीवन और मृत्यु एक चक्र है। एक व्यक्ति जीवन को सफल और सार्थक कर सकता है यदि वह दूसरों के लिए जनहित के कार्य करता रहे, प्रसन्न रहे, कठिन परिश्रम करे और समाज की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहे।
वे पुनर्जन्म पर विश्वास नही करते है। उनका कहना है कि लोगों का भला करो परंतु उनसे कोई अपेक्षा मत रखो। नौजवानों को यही सलाह है कि वे गंभीरतापूर्वक अध्ययन करे और जीवन का भरपूर आनंद ले। वे एक घटना के संबंध में बताते है कि जब वे 13 वर्ष के थे तभी उन्होने भारत पाकिस्तान के विभाजन की विभीषिका को देखा है। आजादी के पहले झेलम में उनका बहुत बडा लकडी का व्यवसाय था। सन् 1947 में उन्हें वह सब छोडकर बडी मुश्किल से दिल्ली होते हुए जबलपुर आना पडा। यहाँ आकर उन्होंने अपना व्यवसाय प्रारंभ किया। कठोर परिश्रम, ईमानदारी के साथ परिस्थितियों पर विजय प्राप्त की। उनके पाकिस्तान से भारत आने के बीच जो अमानवीयता, अनैतिकता, खूनखराबे का दृश्य दिखा वह आज भी उनके मानस पटल पर दस्तक देता है।