मालिक मेरे
काश होता यह दिल बेदिल, पत्थर सा !
क्यू बनाया तुने इसे नरम मोम सा ?
अनुभवता है यह भारी पीड़ा हर समय ।
दर्द और पीड़ा, हो जाती है असहय;
जब देखते है दुख ऑरोका, उनकी मुश्किल;
तब रो लेता है, तड़प उठता है यह दिल ।
अरे अरे मालिक मेरे, यह क्या कर डाला तुने !
रास न आये यह दुनियां के रिवाज़, जो बनाए तुने।
कच्ची कलियों को मसलना, इतने बलात्कार;
असहाय, बूढ़े मात पिता का, करना बहिष्कार ;
अगर बच्ची हो तो, करवाना उस मासुमका गर्भपात;
या वो शराबी पति, जो मारता है बीवी बच्चों को लात ।
क्या हो गया है इस जहां को, क्यों है इतने कंस !
याचना करू, छोड़ दे ओ मालिक मेरे, बनाने उसके वंश ।
Armin Dutia Motashaw