४०.
तुम तक
तुम्हें मिलने में
अर्थ बहुत थे,
आत्मा के पास
संदर्भ अनेक थे।
जिजीविषा के क्षण
स्नेह लिए थे,
टूटी हुई आशा में
विषाद बहुत थे।
पूरब के पास
सुबहें असंख्य थीं,
पश्चिम के अन्दर
सन्ध्या अनन्त थीं।
तुम तक पहुँचने में
व्यवधान विकट थे,
जीवन पर लिखे
लेख अस्पष्ट थे।
समय के हाथ में
निर्मम हथियार थे,
धरती की गोद में
तीर्थ भी मिले थे,
स्नेह हेतु लोग
वर्षों चले थे।
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* महेश रौतेला