एकता
श्रीमती विमलादेवी सुखानी (92 वर्ष) जो कि वर्तमान में इलाहाबाद की निवासी है। उनका चिंतन है कि जहाँ जीवन है वहाँ एक न एक दिन मृत्यु का होना एक शाश्वत सत्य है इसलिये मृत्यु को हमें सामान्य रूप से लेना चाहिए। हमें जीवन में इससे डरकर या घबराकर जीने से हम प्रतिदिन अपने लिए नई नई परेशानियों में उलझ जायेंगे। हमारा जीवन प्रभु की दी हुई अनमोल कृति है इसे भरपूर सुखमय बनाकर समरसता के साथ प्रेमपूर्ण तरीके से व्यतीत करना चाहिए। परिवार में सभी की बातों को समझकर एक दूसरे का सम्मान रखते हुए यदि चलेंगे तो हमें जीवन में संतुष्टि व तृप्ति मिलेगी। हमें कोई भी कार्य करने के पहले परोपकार, जनसेवा एवं धर्म को ध्यान में रखना चाहिए, ऐसा करने से हम समाज में एक मिसाल दे सकेंगें।
सेवा ही सबसे बडा धर्म होता है। वे इस उम्र में भी अपने गृहकार्यों को स्वयं करने हेतु तत्पर रहती है। उनका सोचना है कि इससे उनका स्वास्थ्य ठीक रहता है एवं मस्तिष्क चिंतनशील बना रहता है। जीवन में स्वस्थ्य रहना बहुत आवश्यक है और इसके लिए प्रतिदिन खानपान पर नियंत्रण, व्यायाम एवं योग पर हमारा ध्यान केंद्रित रहना चाहिए। वे आज भी संयुक्त परिवार की हिमायती है। उनका कहना है कि संयुक्त परिवार में जबाबदारियां बंट जाती है और जीवनशैली व्यवस्थित रहती है। आज संयुक्त परिवार की पंरपरा समाप्त होती जा रही है और इसमें विघटन होकर सभी अपनी स्वतंत्रता चाहते है इससे कई बार तो ऐसा होता है कि परिवार के सगे संबंधी भी आपस में कई महीनों तक मुलाकात न होने के कारण आपसी प्रेम, सद्भाव एवं एक दूसरे के प्रति आदर की भावना में कमी हो जाती है जो कि एक अच्छी बात नही है।
उनका पुनर्जन्म में कोई विश्वास नही है और दृढतापूर्वक कहना है कि हमें अपने कर्मों का फल इसी जीवन में चुकाना होता है। वे अपने परिजनों के व्यवहार से पूर्ण संतुष्ट है। वे उदारण स्वरूप बताती है कि कुछ माह पहले वे घर में सीढी से गिर पडी थी और उनकी कमर की हडडी टूट गई थी, उन्होंने अपने जीवन की आषा त्याग दी थी किंतु ईश्वर की कृपा से आपरेशन के बाद से स्वस्थ्य हो गई। उनके परिवार ने इस कठिन समय में जिस तरह उनकी सेवा की उससे उनकी आत्मा तृप्त हो गईं । वे अपना षेष जीवन प्रभु की भक्ति में समर्पित कर उत्साह पूर्वक जीना चाहती है।