क्या फर्क पड़ता है !
क्या फर्क पड़ता है ?
इन शब्दों को अक्सर सुना है,
लेकिन
ये वाक्य जेहन में आता ही तभी है,
जब वाकई कुछ फ़र्क पड़ता है ।
अपने मन समझाने को,
औरों को दिखाने को,
टूट कर सिमटने के भ्रम में जीने को,
या
फिर उस कष्ट को जीने का साहस जुटाने को।
क्या फ़र्क पड़ता है !
बहुत गहरे अर्थ रखता है ।
फ़र्क पड़ने पर ,
किसके
एक रिश्ते की नींव दरकने पर,
किसी रिश्ते की चोरी पर,
साथ छूटने पर ,
या
रिश्तों में औरों के विष बोने पर
फ़र्क पड़ता है ।
हम किसको समझाते हैं,
हम किसको दिखाते हैं,
किस लिए डालते हैं ,
एक झूठ का आवरण ।
शायद खुद के लिए
क्योंकि किसी और को वाकई
कोई फ़र्क नही पड़ता है ।
सच स्वीकारो
हाँ हम वहीं ये कहते हैं
कि
कोई फ़र्क नहीं पड़ता !
जहाँ हम हीं इस फ़र्क को जीते हैं ।
उसमें घुला हुआ जहर भी पीते हैं ।
-- रेखा