इतना बड़ा महायुद्ध
इतना बड़ा महायुद्ध
तुम निहत्थे खड़े रहे
विवेकशून्य लोगों को
समझाते- बुझाते थक गये।
युद्ध जब ठन गया
हाँकने लगे रथ,
वीर के विषाद को
अपने तर्कों से
किया था व्यर्थ,
हथियार उठाये नहीं
विवेक के साथ
उनकी शक्ति से ही
उनके अहं को तोड़ते गये।
हारी हुयी मनुजता को
युद्ध भूमि पर खड़ा कर,
अठारह दिनों तक
आँसुओं को धोते रहे।
दूषित था जिधर मन
उनके विरुद्ध खड़े थे तुम,
ले जाना चाहा
मनुष्य को बहुत आगे,
देखना चाहा उसे
अपने ही पार्श्व में जीवित।
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* महेश रौतेला