My New Poem...!!!!
नादाँ इन्सान चेहरे तो फ़ानी है
हर एक जिस्म को मौत आनी है
कुछ रहती बाक़ी वै कमँ करनी हैं
माना मंज़िल हर बशरकी मुक्ति है
पर प्रभु दरबार में चलती न युक्ति है
बिछड़ना एक दीन जहाँसे नियुक्ति है
बस कुछ देर मात्र की ग़लतफ़हमी है
की दुनयवी दोलत-ओ-पद में शक्ति है
व्यवहार आचरण व दीन-चर्या में भी गर
प्रभु-रटन शामिल है तो हर पल बंदगी हैं
झुकेंगे गर सर दिल से सिर्फ़ हरि-डगर
पर ही फिर तो प्रभु-शरण में भी भक्ति है
किया जीवन व्यतीत इसी प्रतिक्रिया में
तो आख़िरी साँसों से पहले ही मुक्ति है
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