My New Poem ...!!!
कुछ दिनसे हमने दर्द
का चर्चा नहीं किया
दुनिया समझ रही है
शायद हम सकूनमै है
ज़ख़्म को भी बज़ममें
लफ़्ज़ौ की जूबाँ बयाँ
करना हुनर-ए-कामिल
तौ है ही यारों एसे ही
तो अल्फ़ाज़ ग़ज़ल की
शक्ल अख़तयार नही
किया करते है ज़नाब
रंदीप-क़ाफ़िऔको तौड
मरोड़ ज़ौडना पड़ता है
कली से फ़ुल तक सींचना
पड़ता है दिमाग़ी फ़सल से
उपज पयदा करना पड़ता है।
✍️🌲🌹🌴🙏🙏🌴🌹🌲✍️