कड़क चाय
इन दिनों ऑफिस से जल्दी छूट जाती हूँ, न जाने क्यों फिर बृजवासी कैफ़े चली जाती हूँ, उसके उसी कोने वाली टेबल पर बैठ जाती हूँ, तुम्हें तो पता है वहाँ 5 से 6 कम भीड़ होती है। बहुत बार वो टेबल खाली न होने पर मुन्ना खाली करवा देता है। हां, पहले की दो कप की जगह अब एक कप ही चाय आर्डर करती हूं, कड़क चाय, तुम्हारी वाली। वही जो तुम्हारे कड़क होने का पर्याय है। थोड़ी देर सामने बैठे कड़क चाय से निकल रहे भाप में तुम्हें देखती हूँ, पहला घूँट पीकर तुम्हें अपने और क़रीब पाती हूँ, तुम सामने बैठ मेरे चहरे को पढ़ने की जी तोड़ कोशिशें करते हो। फ़िर दूसरा घूँट लेती हूँ, ये घूँट मेरे होने का एहसास दिलाता है, ये घूँट पहले वाले से कम कड़क होता है, बिल्कुल मेरे वाली चाय की तरह।
चाय के हर एक कड़क घूँट के साथ तुम मेरे और क़रीब आते जाते हो।
इन दिनों ऑफिस में भी टाइम पर मैगज़ीन पूरा होने पर अपनी टीम पर गुस्सा करने के लिए तुम्हारी वाली कड़क चाय बनवाती हूँ, वही जिससे तुम्हें इतना गुस्सा आता है।
बहुत बार खुश होने के लिए अपनी वाली चाय भी पीती हूँ, वही, तुम्हारी वाली से थोड़ी कम कड़क।