कैसे बंधन में बाँधा मन को
न धागा है न डोरी है
मंजिल का कोई पता नहीं है
कभी न मिटने वाली दूरी है
होते हैं कुछ पल ऐसे भी
खींच कहीं ले जाते हैं
जोर नहीं चलता कुछ अपना
क़दम वहीं मुड़ जाते हैं
शायद कोई मोड़ हो ऐसा
शायद कोई छोर हो ऐसा
कोई अपना अपने जैसा
वहीं मिलेगा वक्त को थामे