My New Poem ...!!!
ख़ुदगर्ज़ी के हाथों आज बिका है आदमी
दरिंदगीँ हर सीमाएँ तोड़ें बैठा है आदमी
मासुम फ़ुल-सी बच्चियाँ नौँचे हैं आदमी
हिरस-ओ-हव़सकी ग़ुलामी पालें आदमी
बौँए बीज हैवानियत टटोलता है आदमी
नज़र-औ-किरदार से भी गिरा है आदमी
बदबखतीकी हर सीमाएँ छलाँगें है आदमी
ख़ानदानी आन-बान कुचलता है आदमी
बरसों की संस्कृति रस्में मरोड़े है आदमी
खुनरेंजीँ से शख़्सियत भी खौंता हैं आदमी
उजड़े बच्चीके जिस्मोंको भी जलाता आदमी
प्रभुजीके दियों की लो को बूझाता है आदमी
अपने ही गरेबानों को चाकदामन किए ...!!!
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