हर रोज हारता हूँ मैं ,
कभी ख़ुद से ..तो कभी अपनो से ..
कभी क़िस्मत से...तो कभी सपनो से
हाँ...हर रोज़ हारता हु मैं,
मानो खुदा नहीं चाहता के मैं जीत जाऊँ,
इसलिए खुदा से भी हारता हूँ मैं ,
हाँ...हर रोज़ लड़ता हूँ मैं,
हर रोज हारता हूँ मैं.....
कोशिश करता हूँ क़िस्मत को बदलने की ,
लकीरों से हर रोज़ हारता हूँ मैं ..
ख़ुद से हार कर ख़ुद के ही नज़रों में गिरता हूँ ,
हाँ...अपनो से किए वादे भी हारता हूँ मैं...
हर रोज हारता हूँ मैं...
अपनी इच्छाओं को तो छोड़ चुका हूँ मैं ,
अपने दिल में धड़कनो से हारता हूँ मैं...
हर रिश्ते अब दूर होने लगे है ,
रिश्तों को निभाने में भी हारता हु मैं....
हर रोज़ हारता हूँ मैं....
हर लड़ाईं अपने दम पर जीतने के लिए ,
हर रोज़ समय से लड़ता हूँ मैं...
गिरा कर आगे बढ़ जाता है समय भी ,
हाँ..हर रोज़ समय से भी हारता हूँ मैं...
हर रोज हारता हूँ मैं...
अब कुछ नहीं हारने के लिए मेरे पास ,
ख़ुद भी हार चुका हूँ मैं...
फिर भी क़िस्मत को सुकून नहीं ,
हर रोज़ लड़ती है मुझसे ...
हाँ...लड़ूँगा आख़री साँस तक मैं,
चाहे आख़री साँस भी हार जाऊँ मैं....
हाँ...हर रोज़ लड़ूँगा मैं.........
हर रोज़ हारता हूँ मैं.......।
-A A राजपूत ‘अक्श’