पुरुष को गाली
तुम क्यों उस पुरुष को गाली दे रहे हो
जो अपने परिवार के लिए जी रहा हो
आप की हर ख्वाइस पूरी कर रहा हो
जो रोज सुबह पैसो के लिए दौड़ रहा हो
जो तुम्हारे सपनो को जिंदा रख रहा हो
और अपने अरमानो को जला रहा हो
जो रोज अंदर ही अंदर टूटता जा रहा हो
और रोज नए हौसले के साथ जुड़ता जा रहा हो
जब रिश्ता तय करने जाती हो तो
गाड़ी बंगला और घर अलग से मांग लेती हो,
उस वक़्त सामने वाले की फिक्र करती हो ,
यदि नहीं तो
खुद की फ़िक्र के लिए समाज में ढोल क्यों पीटती रहती हो
एक बलात्कार के इलज़ाम में
तुम पूरी कौम को गाली दे जाती हो,
उस वक़्त शर्मिंदगी भी महसूस कर जाती हो,
जब दहेज़ का गलत इलज़ाम लगाकर
किसी निर्दोष को सलाखों के पीछे भेज देती हो,
उस वक़्त शर्मिंदगी को लेकर कहा छुप जाती हो
ये बताओ जब अपने बाप के घर को छोड़ कर
किसी गैर के साथ भाग जाती हो,
और जब अकल ठिकाने आये तो रो-रो कर
अपने बाप के घर फिर वापस आ जाती हो,
अपनी ये गलति दुनिया को क्यों नहीं बताती हो
अनैतिक सम्बन्धो में तुम भी शामिल होती हो,
पकडे जाने पर सारा जिम्मा पुरुष पर डाल देती हो
फिर लाखो रूपये लेकर पति से तलाक़ भी लेजाती हो,
ये बताओ तुम साबित क्या करना चाहती हो
दुसरो को सोच बदलने के लिए बोल रही हो
ये बताओ तुम अपनी सोच कब बदल रही हो
कविता के रचनाकार:
वेद चन्द्रकांतभाई पटेल
२४,गोकुल सोसाइटी ,
कड़ी ,गुजरात
Mob.-9723989893