अपनी बेटी को क्यों मार रहा हे
तू अपनी बेटी को क्यों मार रहा हे ,
कुख में जो पल रहा हे , वो तेरा क्या बिगाड़ रहा हे ,
कोन सा नशा आ रहा हे, जो तू हैवान बने जा रहा हे
पायल की झंकार बजनी बाकि हे,
कोयल सी आवाज़ सुननी बाकि हे ,
घर में सेहनाइ गुंजनि बाकि हे ,
ज़िंदगी को अभी आँखे खोलनी भी बाकि हे
उस दो महीने की बच्चिने तेरा क्या बिगाड़ा
जो तूने अपने दोनों हाथो से उसका गला रोंग डाला
ज़िंदगी तो उसे रेहमान ने बक्सी हे ,
तू खुद उस ज़िंदगी को एक रेहम बक्श दे ,
तू बस उस मासूम को एक जीवन बक्श दे
उसका भी उतना हक़ हे , जितना तुम जताते हो
बस वो कुछ बोल नहीं पाती , तुम भी कुछ समज नहीं पाते हो
पैरो में बंधी ज़ंज़ीर को तोड़ दे ,
उसको बोल वो हर बंधन को छोड़ दे ,
तू बस खुद को खुद से जोड़ दे
खुले नीले आसमान में उड़ने दे ,
समुन्दर के नीले पानी में तैरने दे ,
उसी की नीली आँखों में उसे बहने दे ,
जीवन को यही रहने दे
जीवन का हर रस उसे पी लेने दे ,
ज़िंदगी एक ही बार मिलती हे,
जी भर के उसे जी लेने दे
कविता के रचनाकार:
वेद चन्द्रकांतभाई पटेल
२४,गोकुल सोसाइटी ,
कड़ी, गुजरात Mob.-9723989893