Hindi Quote in Story by Dr. Vandana Gupta

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संतुलन

"शर्मा जी के बेटे ने सुसाइड कर लिया.." बेहद थका सा स्वर था वर्षा का..
"ओह! कब कैसे और क्यों?" उसके पति विवेक एकदम से हिल गए। भौतिकवेत्ता और विद्वान प्रोफेसर विवेक को आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धान्त पर आधारित उनके शोध के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जा चुका था। उनका बेटा नकुल उनकी आशानुरूप पढ़ाई नहीं कर पा रहा था, जबकि शर्माजी का बेटा आई आई टी में चयनित हुआ था और वे यदा कदा उससे बेटे की तुलना कर दुखी भी होते और वर्षा को उलाहना भी देते कि उसकी ढील से नकुल पढ़ाई में पिछड़ गया।

"देखो जी! मैं सापेक्षता सिद्धान्त तो नहीं समझती, पर आप जो ये नकुल को शर्माजी के बेटे के सापेक्ष कमतर आँकते हो ये गलत है, सबकी अपनी क्षमताएँ हैं, अपनी उपलब्धियाँ हैं, हमारा बेटा जैसा भी है अपनी तरह का इकलौता है, वह खुश है तो हम खुश हैं.." वर्षा की इस बात को विवेक स्वाभाविक ईर्ष्या कहकर खारिज कर दिया करते थे।

"सुनो जी! आपने कभी कुम्हार का घूमता चाक देखा है..?" वर्षा का प्रश्न उन्हें फिर चौंका गया।
"हाँ, क्यों? क्या कहना चाहती हो..?"
"घूमते चाक पर गीली मिट्टी हमारे बच्चे हैं, उस पर पानी के छींटे हमारा प्यार है... घूमते चाक पर अंदर और बाहर से सही पकड़ हमारी परवरिश है और जिस तरह से कुम्हार मिट्टी को थपकी देकर सुंदर मर्तबान में ढाल देता है.. वह संतुलन यदि हम बना सकें तो बच्चे भी निखरते हैं, वरना तो शर्मा जी के बेटे की तरह बिखर जाते हैं।"

"अरे वाह! अभिकेंद्री और अपकेंद्री बल का जीवन में इतना सुंदर अनुप्रयोग कहाँ से सीखा तुमने?"

"ये बल वल मैं नहीं जानती, मैंने भौतिकी नहीं पढ़ी.."

शोकेस में सजे मेडल और सम्मानपत्र विवेक को अचानक ही निरर्थक लगने लगे।

©डॉ वन्दना गुप्ता
मौलिक
(10/11/2018)

Hindi Story by Dr. Vandana Gupta : 111312986
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