My New Poem ....!!!!
मुझसे बात करने से बढ के
भी कोई काम है क्या
दीवानगी एक एसी बला हैं जो
चैन से कभी जीने नहीं देती
बंद होंठों से कुछ ना कहकर,
आँखों से प्यार जताती हो
जब भी आती हो तुम
हम्मे हमसे ही चुरा ले जाती हो
पहले तो दिवाना नज़र के तीर से
घायल कर हमें बना ही देती हो,
फ़िर दूर ही से दूरी बनाए रखती हो
और बाँहोंके घेरेके ख़्यालों से सतातीं हो
रुसवाइयाँ तो अँगड़ाईं की परछाई भी,
जिस्म-नुमाइशी का सबब बन जाती हैं
नशा मद-मस्त जवानी का भी एक दीन,
वक़्त की दहलीज़ पर दम तोड़ देता है
बीते जो पल प्रभु-परस्ती की दीवानगी में
सरमाया जहाँ से जाने के सफ़र का वही है बस
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