My New Poem...!!!!
खामोश-से लबों से निभाना था
हमको यह मोहब्बत का मासूम रिश्ता
पर ...!!
बे-वफ़ा धड़कनों ने चाहत का
ख़ामोशी से शोर-औ-गुल मचा दिया
बयान न करनी थी जो बात ज़ुबान से
ऑखो ही ऑखो में ऑखो से बयान कर दी
उल्फ़त की नगरी के बासीदें जलते हैं
आशिक़-औ-माशुक़ की लो पर ता-उम्र
पर...!!
चिराग़-ए-मोहब्बत सीने में रोशन रखते हैं रुसवाई-ए-यार से परहेज़ बरक़रार रखते हैं
कुछ तो बात है अल्फ़ाज़-ए-मोहब्बत में
कशिश-ए-जुनूनमें जल कर भी हंसते रहते
एसे ही तो शीरी-महिवाल, लैला-मजनू व हीर-रांझा ख़ुद घायल नहीं हूए अपने फ़न में
अलग बात है कि जो इश्क़-ए-हक़ में जले
मीरा साईं नानक कबीर-औ-बुद्ध कहलाए।
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