कल अखबार में निर्भया बलात्कार केस के बारे में पढ़ा,
निर्भया की मां का इंटरव्यू भावुक करने वाला था।
----
उनके कथानुसार 7 साल पहले वे एक सामान्य गृहणी थीं जिसे अपने परिवार की खुशी में अपनी खुशी मिलतीं थी।
अचानक निर्भया के साथ हुए हादसे ने ज़िन्दगी बदल दी।
जो समय रसोई बनाने व घर के कामों में बीत रहा था अचानक अदालत व पुलिस चौकी में बीतने लगा।
जो बातें न सुनने में अच्छी लगतीं थीं न कहने में उन बातों को कहना व सुनना पड़ा।
पूरे देश का समर्थन होने के बावजूद न्याय मिलना असंभव लगने लगा था।
वे डटीं रहीं , कभी परिवार, कभी समाज, कभी अदालत तो कभी पुलिस के साथ लड़ाई लड़तीं रहीं।
और आज जब न्याय मिलना तय है फिर भी आरोपियों की सज़ा , जिनके वे हकदार हैं, मुहर लगना अब भी बाकी है।
-------
यहां इस देश में कहा जाता है की
"हज़ारों गुनहगार छूट जाएं पर एक बेगुनाह को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए"
मेरे विचार से इस विधान को कुछ इस तरह बदलने दिया जाए
"अगर हज़ार गुनाहगारों को सज़ा दिलाने में एक बेगुनाह कुर्बान होता है तो होने दें"
उन हज़ारों लाखों गुनहगारों को कानून से छूटने पर जितना भरोसा है उतना विश्वास कानून पर न्याय दिलाने के लिए देशवासियों में नहीं दिख रहा।
अगर कानून नहीं बदला तो लोग अपना बदला खुद लेने लगेंगे और फिर छूटने का विश्वास भी बना लेंगे।
जय हिंद।