वसी शाह:
उसे हम याद आते हैं फकत फुरसत के लमहों में,
मगर यह बात भी सच है उसे फुरसत नहीं मिलती।।
गालिब:
हम तसलीम करते हैं हमें फुरसत नहीं मिलती,
मगर जब याद करते हैं तो जमाना भूल जाते हैं ।
इकबाल:
जमाना भूल जाते हैं तेरी एक दीद की खातिर,
खियालों से निकलते हैं तो सदियां बीत जाती हैं।
सागर:
सदियां बीत जाती है खियालों से निकलने में,
मगर जब याद आती है तो आंखें भीग जाती है ।