इंजीनियरिंग कॉलेज कई मायनों में बाकी शिक्षा संस्थाओं से अनुशासन के मायने में अलग होता है । नेता गिरी, क्लास बंक, धरना प्रदर्शन जैसी चीज़ें एक इंजीनियरिंग स्टूडेंट के जींस तक में नहीं पायी जातीं ।
हमारा सेकंड ईयर का हॉस्टल बहुत बड़ा था, 400 कमरों का और हर 10 कमरे पर एक बाथरूम मौजूद थे इस तरह 40 बाथरूम थे पर ऑपरेटिव केवल 9 थे, लाइनें लगतीं थीं सुबह की ज़रूरतों के लिए ।
मैं भी इन लाइनों में शरीक तो होता था पर दिल और पेट दोनों इस सिस्टम को एक्सेप्ट करने को तैयार नहीं थे । एक दिन अपने 10 दोस्तों के साथ मैं सुबह 6 बजे कॉलेज बिल्डिंग पहुँच गया और वहां फ्रेश हुआ । अब ये रुटीन बनने लगा और संख्या 10-20-30 होते हुए 50-60-70 तक पहुँच गयी । अब तक जो लाइनें हॉस्टल के भीतर लग रहीं थीं वो खुले आम नज़र आ रहीं थीं ।
लेक्चरर, प्रोफेसर, डीन, सीनियर, जूनियर सबके सामने हम लाइन लगाए खड़े रहते थे वो भी बरमूडा/बॉक्सर और बनियान में ।
एक सोच आन्दोलन में बदल गयी और जो बाथरूम 10 सालों से बंद पड़े थे रातों रात चालू करवाये गए ।
सही सोच से किया गया हर काम गाँधी गिरी होता है