एक शोर सा सुनाई देती हूं मैं...
हर भीड़ में दिखाई देती हूँ मैं...
यूँ बदल गया है आइना मुझसे...
के खुद को अजनबी सा दिखाई देती हूं मैं...
क्या आरज़ू क्या चाह रही मेरी...
क्या मंज़िले क्या राह रही मेरी...
खो गई हूं नाजाने किस राह में...
के अब धुल सा दिखाई देती हूं मैं...
जो तू था तो क्या था...
जो तू नहीं तो क्या रहा...
ये वक़्त भी जो तराज़ू सा है...
जो खुद को तोलते सी दिखाई देती हूँ मैं...
न खुद को समझ सकी न ज़िन्दगी को...
न कोई उम्मीद न कोई करार रहा...
पर इन जस्बातों के खेल में...
खुद ही खेलते सी दिखाई देती हूँ मैं...