सुदंर कविता ..
रुठती क्यूं हो बेगाने की तरह ।
आ दिल मिला लें अपनों की तरह ।।
ख्वाबों में आती हो अपनों की तरह ।
हकीकत बन जाओ प्रेमिका की तरह ।।
याद करती हो रोज एक हिचकी की तरह ।
दिल में तुम्हें बसा लूं रानी की तरह ।।
सताती रोज हो दिलबर की तरह ।
आ कसमें खा ले सातों जन्मो की तरह ।।
प्रेम में बंध जाये राधाकृष्ण की तरह ।
कभी न जुदा हो हीर रांझा की तरह ।।
तेरा दिल अपना बना लूं अपनो की तरह ।
तुझसे कभी न बिछडूं मनमीत की तरह ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,धंबोला ,अमदाबाद ,गुजरात ।।