सुदंर मुक्तक ..
विषय .इन्तजार ..
मात्राभार .24 .
जख्म इतने गहरे हैं इजहार क्या करें ।
हम खुद निशाना बन गये वार क्या करें ।
मर गये हम मगर खुली रह गयी आँखें ।
अब इससे ज्यादा इन्तजार क्या करें ।।
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वो हमसफर कैसे थे जो बीच सफर में छोड गये ।
बिना कसुर हमसे प्यार का नाता भी तोड गये ।
वो कभी हमको याद करते यह मालुम नहीं ।
खुद की यादों में हमको तड़पता छोड़ गये ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,धंबोला ,हाल .अमदाबाद ,गुजरात ।