शीर्षक - 'तन्हा उदास शाम'
तन्हा उदास शाम को जब कभी दूर निकल जाऊं मैं,
एक तुझे याद करूं और गजल गुनगुनाऊं मैं,
ना पूछ मेरे हमनशी क्या हो रहा है जमाने में
मुझे अपनी ही खबर नहीं औरों की क्या बताऊं मैं
तन्हा उदास शाम को जब कभी दूर निकल जाऊं मैं,
एक तुझे याद करूं और गजल गुनगुनाऊं मैं।
इश्क ना सही मुझसे मगर रंजिश तो रख दिल में तू
है यही आरजू तेरे किसी काम तो आऊं मैं,
तू मुझे भूल गयी, यह तेरे इख्तियार की बात है
लेकिन यह मेरे बस में नहीं की तुझे भूल जाऊं मैं
तन्हा उदास शाम को जब कभी दूर निकल जाऊं मैं,
एक तुझे याद करूं और गजल गुनगुनाऊं मैं।
तुझको नहीं हो शायद मैं तो करता हूं, प्यार तुझसे
राह में रोककर भला तुझको, यह कैसे बताऊं मैं,
जिंदगी की सूनी राह गुजर, ना साथ कोई हमसफर, ना कोई मंजिल मेरी, फिर भी चलता जाऊं मैं
तन्हा उदास शाम को जब कभी दूर निकल जाऊं मैं,
एक तुझे याद करूं और गजल गुनगुनाऊं मैं।
हमें बड़ा अजीज था, बड़े काम की चीज था
कहेंगे यही लोग, जो कल को मर जाऊं मैं
'अभिषेक' से ना पूछिए, कितने जख्म हैं, उसे मिले
दो - चार की बात नहीं, जो उंगलियों पर गिनाऊं मैं।
तन्हा उदास शाम को जब कभी दूर निकल जाऊं मैं,
एक तुझे याद करूं और गजल गुनगुनाऊं मैं।