एक गलत और दूसरा सच्चा
एक बाप बेटी की कहानी
जो आप सबको है सुनानी।
चंचल सी नादान
दुखों से थी अंजान।
भोली सूरत और मासूमियत
उसकी थी पहचान।।
होश संभाला जबसे।
देखा पापा की आँखों में
सपने पलते हैं कब से।।
बीता बचपन आई जवानी
पापा के सपने की बनी कहानी।
एक दिन वो वक्त भी आया
जब सपने ने रंग दिखाया।
खुशियाँ घर में बरसने आई
चारो तरफ छाई खुशहाली।
पर किस्मत ने ना साथ दिया
और सब को बर्बाद किया।
हार तबाही सब कुछ लाई
अपने संग ले गई खुशहाली।।
बेटी ने देखा पापा को
टूटते और बिखरते खूब।
कुछ कर सकती ना थी
उसमें क्षमता ना थी भरपूर।।
फिर समय ने करवट बदला।
समय कुछ आया ऐसा अगला।
बेटी ने संकल्प लिया
कुछ करने की ठान लिया।
बेटी के भी खुद के सपने थे
जिनको उसने भी पूरे करने थे।
राह निकाली कुछ ऐसी उसने
जिससे पूरे हों दोनों के सपने।
ग्लैमर की दुनिया है ऐसी
जिससे क्यूँ डरते हैं सभी
चकाचौंध की इस दुनिया में
उसे बनानी थी पहचान अभी।।
सपने जो देखे बेटी ने
ना मंजूर किये सभी ने।
पर जिद थी कुछ करने की
सबके लिए ए बात थी डरने की।।
किस्मत ने एक खेल रचाया
बेटी को ग्लैमर की नगरी पहुँचाया
पापा को चिंता बेटी की
उसकी सुरक्षा की सेक्योरिटी की।
बेटी की सुरक्षा के कारण
स्वांग रचाया गुस्से का।
बेटी भी कम ना थी
सच जानती थी इस रिश्ते का।।
अपने सपने के माध्यम से
पापा का सपना पूर्ण करूँ
दुनिया ने भी अपना रोल निभाया
जो भी हो आखिरी दम तक लडूँ।।
मोह प्रेम संकल्प खेल में में
पापा बेटी दो मोहरे थे।
दुनिया वाले रोड़े अड़चन
रिश्ते उनसे भी दोहरे थे।।
पापा चाहे बेटी की सुरक्षा
बेटी पूरी करना चाहे पापा की अकांक्षा
दोनों अपनी राह पर सच्चे
दोनो की है सच्ची मंशा।
फिर एक गलत कैसे दूसरा सच्चा।।।
अर्चना यदुवंशी