"असली बात"(लघुकथा)
कॉलेज के पिछवाड़े पेड़ के नीचे कक्षा लगती थी। हिंदी की क्लास थी। प्रोफ़ेसर साहब मंथर गति से चलते हुए आ रहे थे। दूर ही से उन्होंने सुना, छात्रों में गरमा- गरम बहस हो रही है। बच्चे हिंदी की दुर्दशा को लेकर बात कर रहे थे। कोई कहता था, सरकार हिंदी की उपेक्षा करती है, कोई कहता कि सब जनता का दोष है। कोई कोई कहता प्रादेशिक भाषाओं के कारण हिंदी पिछड़ रही है, तो किसी का ख्याल था कि अंग्रेज़ी मोह ने बंटाढार किया है।
छात्रों को विषय में रस लेते देख कर प्रोफ़ेसर साहब को मज़ा आ रहा था। वे उनकी बातें सुनते हुए चले आ रहे थे।
उनके आते ही विद्यार्थी चुप हो गए।
क्लास में आकर उन्होंने छात्रों से कहा, तुम लोग जो चर्चा कर रहे थे, उसी को जारी रखते हैं।
वे बोले- तुम ठीक कहते हो कि हिंदी की हालत दिनों - दिन बदतर होती जा रही है। पर क्या तुम बता सकते हो कि हिंदी की ऐसी हालत के लिए कौन जिम्मेदार है?
- सरकार!
- नेता लोग!
- जनता!
- अंग्रेज़ी...
तरह - तरह के जवाब आने लगे।
वे छात्रों से बोले- बारी - बारी से सब बताओ कि तुम्हारी मातृभाषा क्या है?
विद्यार्थी खड़े होकर बोलने लगे- मारवाड़ी, मेवाड़ी, मालवी, अवधि, भोजपुरी, बुंदेलखंडी, हाड़ौती, ढूंढाड़ी, शेखावाटी, ब्रज...
प्रोफ़ेसर साहब मुस्कुराते हुए बोले- शाबाश! ये सब जो तुम बोल रहे हो, ये तुम्हारे घर हैं। और इन सब घरों को जोड़ने वाली गली की जो सड़क है, वो है हिंदी। अब तुम बताओ, क्या तुम जैसे अपने अपने घर की सफ़ाई करते हो, वैसे ही घर के सामने की सड़क की सफ़ाई भी रखते हो?
सब चुप हो गए।
- तो बताओ हिंदी की दुर्दशा का ज़िम्मेदार कौन?
सन्नाटा छा गया और नीम के पेड़ पर से पंछियों के चहचहाने की आवाज़ आने लगी।