स्व रचित
मीनाकुमारी शुक्ला 'मीनू '
रे...मन...कर ले कुछ दया कुछ भलाई
जीनव भर तूने की खूब कमाई,
अंतिम वेला प्रभु मिलन की आई,
साथ चली नहीं कौडी, पैसा-पाई,
खूब तूने रिश्तेदारी निभाई,
पकडे न हाथ तेरा बन्धु- भाई,
मिट्टी का खिलौना मिट्टी में मिल जाई,
पैसा-रुपया, कौडी, बन्धु-भाई,
साथ चले नहीं कोई दे दुहाई,
रोयें चार दिन बन्धु व भाई,
फिर रुपये-पैसों पर नजर गडाई,
हुआ जब हिसाब फिर हुई लडाई,
छूटे भाई-बन्धु बने लोग-लुगाई,
आई समझ झूठे रिश्ते झूठी कमाई,
रे... मन.. भज..ले.. कृष्ण कन्हाई ।