जातिवाद के विचारों को थोप कर दुनिया हुई है बावली,
कहा गई वो जो समाजसेवा के लिए थी उतावली,
यू तो सिखाते हो शिष्टाचार अपने परिवार को,
फिर कहा जाती है अपने संस्कार ?
फिर क्यों ली जाती है मासूमो की जान?
न तो लहू दूजा है न तो शरीर,
अपनी जिम्मेदारी को समझ रे ओ मनुष्य,
तुजे आज इतनी सुविधाओं से सज्ज करने वाले कि जाति नही पूछी तूने,
न तो तुजे बनाने वाले कि,
फर्क सिर्फ 'समाज ' से है ?
तो मिल कर क्यों न करी जाए तरक्की?
देश आगे बढ़ेगा,
तू खुद बड़ा बनेगा
✍आर्यन परमार
- Justice_for_Dr.Payal
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