बस टेढ़े मेढ़े रास्तों से गुज़र रही थी,
तभी मेरी सामने वाली सीट पर एक औरत आकर बैठी,
उसने सर से पल्लू हटाया,
मेरी नज़र उसके चेहरे पर पड़ी झुर्रियों पर गई,
मानो चेहरे पर टेढ़ी-मेढ़ी लकीरों का एक मेला लगा हुआ है,
कुछ देर बाद,
उसने अपने दाएँ हाथ की उंगलियां अपनी पेशानी पर रखी...
जिसके नाखूनों पर मेंहदी का हल्का सा रंग चढ़ा हुआ था,
तो ऐसा लगा मानो जैसे, सोलह साल की कुछेक सहेलियाँ उस मेले में घूमने निकली हैं!
….........................................................JaE.