#KAVYOTSAV -2
माँ
पहले डरती थी, एक पतंगे से,
माँ हूँ, अब साँप मार देती हूँ,,
चलता है, एक परिवार मेरे काँधे,
अक्सर, अपने सपने भी मार देती हूँ।
यूँ ही नहीं समाता, मुझमें सँसार सारा,
लगभग मरकर ही, जीवन संचारती हूँ,,
कहते हैं कैसे पहुँचता, वो सब जगह,
भगवानरूपी हूँ, हर जगह पायी जाती हूँ।
मूल्य खत्म हुए, मर गयी नैतिकता,
नित मरते इस समाज को, देखे जाती हूँ,,
आज़ के आधुनिक, विकास के युग में,
वृद्धाश्रम में भी, अब पहुँचाई जाती हूँ।
ना चुका पाओगे, कर्ज़ मेरा आसानी से,
फिर भी तम्हें, आशीष दिए जाती हूँ,,
हरदम तम्हें, आशीष दिए जाती हूँ।