#काव्योत्सव 2
विषय - हक और कर्तव्य
हक चाहिए किसे नहीं, सभी लेने कि फिराक में बैठे है।
अपनी आशाओं तले ,भावनाओ को दरकिनार कर बैठे है।
हक़ चाहिए मिलना यही सोचकर दिलो से खेल बैठे है।।
हक चाहिए मिलना यही सोचकर क्यों टिकाये बैठे है?1
क्यों नहीं दिखता किसी ओर का हक़ हमें?
क्या उसके जीने का अधिकार भी, हम लिए बैठे है?
बोलने की आजादी जब है सबको मिली।
क्यों उस पर भी केवल अपना ही हक मान बैठे है।।
हक़ चाहिए मिलना यही सोचकर क्यों टिकाये बैठे है।।2
'अभिव्यक्ति' में मतभेद से,आजादी 'खत्म' नही 'प्रारम्भ' होती है।
पर याद रहे अभिव्यक्ति में,'सुनने' की भी दरकार होती है।
सुनना छोड़ क्यों सिर्फ बोलने की फिराक में बैठे है।
हक़ चाहिए मिलना यही सोचकर क्यों टिकाए बैठे है।।3
अधिकारों के साथ जब कर्तव्य भी जुड़े रहते है।
फिर क्यों भूलकर उन्हें केवल हक की ही बात करते है।
क्यों हक़ को आगे,ओर कर्तव्य को नेपथ्य में ढकेल कर बैठे है।
हक़ चाहिए मिलना यही सोचकर, क्यों टिकाए बैठे है।।4
कर्तव्यों को अपनाकर देखो,खुशियाँ ख़ुद चलकर आएंगी।
खुशियां आते ही जीवन मे, 'विजय' पताका लहराएंगी।
कर्तव्य को हक़ से आगे रखो, अब किसके इंतजार में बैठे है।
हक चाहिए मिलना यही सोचकर क्यों टिकाए बैठे है।।5
विजय कुमार शर्मा 'विजय'